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विश्व में सुप्रा-प्लेक्स के नाम से जाना जाएगा डॉ. मयंक का नैनो एक्सिपिएंट फार्मूला

शिक्षक दिवस पर डॉ. मयंक की पेटेंटेड तकनीक का शुभारंभ -दवाएँ होंगी और भी सुरक्षित व असरदार

[International news America] :- भारतीय मूल के साइंटिस्ट डॉ. मयंक के नैनो फार्मूला को अब पूरा विश्व सुप्रा-प्लेक्स के नाम से जानेगा। इसके साथ ही इस पेटेंटेड तकनीक से दवाएँ और भी सुरक्षित व असरदार साबित होगी। 5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस के अवसर पर संयुक्त राज्य अमेरिका-मिशिगन स्थित “नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर” के प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक पद पर कार्यरत डॉ. मयंक सिंह एवं संस्थान के सीईओ डॉ. डोनाल्ड टोमालिया ने संयुक्त रूप से विगत पांच वर्षों के प्रयास के बाद एक्सिपिएंट की अगली तकनीक “सुप्रा-प्लेक्स एक्सिपिएंट्स” की आधिकारिक घोषणा की।

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प्रो. डॉ. डोनाल्ड टोमालिया के 87वें जन्मदिवस पर उन्हें समर्पित करते हुए डॉ. मयंक ने कहा कि अब यह तकनीक दुनियाभर में “सुप्रा-प्लेक्स (नैनो) एक्सिपिएंट” के नाम से जानी जाएगी। कोविड-19 महामारी के दौरान विकसित की गई यह तकनीक पूरी तरह से डेंड्रिटिक संरचना पर आधारित तकनीक है। शुरुआती दिनों में इसे केवल एक्सिपिएंट कहा जाता था। आज यह वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त कर चुका है और अब इसे “सुप्रा-प्लेक्स (नैनो) एक्सिपिएंट” के नाम से जाना जाएगा, जो कि दवाओं को सुरक्षित, असरदार, और सस्ती, बनाने वाली तकनीक है।

डॉ. मयंक एवं डॉ. टोमालिया द्वारा संचालित यह संस्थान डेंड्रीमर विज्ञान एवं नैनो-सक्षम समाधानों के क्षेत्र में अपनी अग्रणी अनुसंधान एवं अनुप्रयोग आधारित उपलब्धियों के लिए वैश्विक स्तर पर विख्यात है।

अंतरराष्ट्रीय मान्यता प्राप्त तकनीक:

यह अमेरिका-आधारित पेटेंटेड तकनीक है, जिसका नेशनल फेज़ एंट्री भारत, यूरोप, कनाडा और मैक्सिको सहित कई देशों में हो चुका है। इसका मूल उद्देश्य दवाओं और अन्य रासायनिक एजेंटों को पर्यावरण के अनुकूल, सुरक्षित और न्यूनतम लागत पर उपलब्ध कराना है। इस सुप्रा-प्लेक्स तकनीक को डॉ. मयंक सिंह ने प्रो. टोमालिया और उनकी टीम के साथ मिलकर विकसित किया, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त है और कई वैश्विक नियामक मानकों को सफलतापूर्वक पार करते हुए न केवल सुरक्षित सिद्ध हुई है बल्कि उचित मात्रा में जैविक प्रणाली के लिए सुरक्षित है। साथ ही यह पर्यावरण में बायोडिग्रेडेबल भी है, जिससे इसका पर्यावरण पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता।

विस्तृत औद्योगिक उपयोग:

यह बहुआयामी तकनीक फार्मास्यूटिकल्स, न्यूट्रास्यूटिकल्स, फूड सप्लीमेंट्स, कॉस्मेटिक्स, वैक्सीन, पशु चिकित्सा उत्पाद, कृषि उर्वरक, औद्योगिक गोंद, आग बुझाने की संरचनाएँ, खाद्य पदार्थों का संरक्षण और पेय उद्योग जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में उपयोगी साबित हैं।

सुप्रा-प्लेक्स की वैज्ञानिक विशेषताएँ:

सुप्रा-प्लेक्स तकनीक को विशेष इसलिए माना जा रहा है क्योंकि यह दवाओं को न्यूनतम लागत पर अधिक सुरक्षित और प्रभावी बनाने की क्षमता रखती है। यह दवाओं की पानी में घुलनशीलता और जैव उपलब्धता को बढ़ाती है, जिससे शरीर में उनका असर तेज़ और बेहतर होता है। साथ ही यह दवाओं के स्वाद और गंध को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखती है, जो मरीजों के लिए सेवन को आसान बनाती है। इस तकनीक से दवाओं की स्थिरता में सुधार होता है, जिससे उनकी शेल्फ लाइफ़ बढ़ती है। इतना ही नहीं, सुप्रा-प्लेक्स का उपयोग केवल दवाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि कृषि क्षेत्रों में भी व्यापक रूप से किया जा सकता है।

एक्सिपिएंट-औषधि वितरण प्रणाली का आधार:

डॉ. मयंक ने कहा एक्सिपिएंट दवाओं के निर्माण में एक आधारभूत भूमिका निभाते हैं। इनके बिना कई औषधीय उत्पाद स्थिर और प्रभावी रूप में बन ही नहीं सकते। सुप्रा-प्लेक्स जैसी नयी तकनीक दवाओं को अधिक स्थिर बनाएगी, उनकी शेल्फ-लाइफ़ बढ़ाएगी और मरीज़ों तक सस्ती कीमत पर पहुँचाएगी। यह बहुक्रियाशील और न्यूनतम मूल्य वाला एक्सिपिएंट औषधि उद्योग और समाज दोनों के लिए गेम-चेंजर है।

उदाहरण के लिए, डॉ. मयंक ने बताया कि एक्सिपिएंट दवा का वाहन है, जो दवा को सही जगह तक पहुँचाने के लिए बस या कार की तरह काम करता है। यह दवा को खून और ज़रूरी ऊतकों तक पहुँचाता है । सुप्रा-प्लेक्स एक डेंड्रिटिक संरचना पर आधारित बायोडिग्रेडेबल नैनो एक्सिपिएंट है, जिसका कण आकार 10 नैनोमीटर से भी कम है। इतने छोटे आकार के कारण यह दवा को खून और ज़रूरी ऊतकों तक आसानी से पहुँचा देता है और बाद में आसानी से टूटकर शरीर से बाहर निकल जाता है। साथ ही यह पर्यावरण में बायोडिग्रेडेबल भी है, जिससे इसका पर्यावरण पर कोई हानिकारक प्रभाव नहीं पड़ता।

डेंड्रिटिक संरचना का अर्थ:

डॉ. मयंक ने डेंड्रिटिक संरचना का अर्थ भी स्पष्ट रूप से समझाया है। उनके अनुसार डेंड्रिटिक संरचना का मतलब है ऐसी त्रि-आयामी आकृति, जो बिल्कुल पेड़ की शाखाओं जैसी होती है। हर शाखा पर नई शाखाएँ निकलती हैं और इस तरह यह जटिल लेकिन संगठित नेटवर्क बनाता है। यही विशेषता इसे अनोखा बनाती है, क्योंकि इसमें दवाओं को सुरक्षित रूप से “फँसाने” और “जोड़ने” दोनों की क्षमता होती है। इस वजह से सुप्रा-प्लेक्स दवा को सही तरीके से पकड़कर खून और वांछित ऊतकों तक पहुँचा सकता है, और फिर काम पूरा होने के बाद शरीर से आसानी से बाहर निकल जाता है।

वैज्ञानिक टीम और नेतृत्व:

टीम में शामिल वैज्ञानिकों में प्रो. डॉ. डोनाल्ड टोमालिया, मुख्य कार्यकारी अधिकारी के रूप में नेतृत्व कर रहे हैं। उनके साथ डॉ. डेविड हेडस्ट्रैंड, उपाध्यक्ष (अनुसंधान एवं विकास), तथा लिंडा निक्सन, उपाध्यक्ष (ऑपरेशन्स) के रूप में लंबे समय से कार्यरत हैं। इस टीम में मिर्जापुर जिले के चुनार तहसील के नारायणपुर विकास खण्ड के बगही गांव निवासी वैज्ञानिक डॉ. मयंक सिंह इसी संस्थान में प्रधान वैज्ञानिक एवं निदेशक के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

भारत के झाँसी और हैदराबाद से हासिल की शैक्षणिक एवं व्यावसायिक योग्यताएँ: 

डॉ. मयंक ने अपनी प्रारंभिक फार्मेसी शिक्षा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झाँसी (भारत) से प्राप्त की। इसके उपरांत, उन्होंने हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईसीटी), से फार्मास्युटिकल साइंस और प्रौद्योगिकी में पीएचडी की उपाधि अर्जित की है। साथ ही, उन्होंने नलसर विश्वविद्यालय, हैदराबाद से पेटेंट कानून में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी पूर्ण किया है।

अतिरिक्त कर्तव्य और ज़िम्मेदारियाँ: 

आपको बताते चले की, वर्तमान में डॉ. मयंक “विश्व स्वास्थ्य संगठन”, जिनेवा-स्विट्ज़रलैंड के सार्वजनिक सलाहकार हैं। और “सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन” में ग्रेजुएट फैकल्टी एवं एडजंक्ट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। इसके अलावा, वह यूनाइटेड किंगडम-लंदन में रासायनिक जीव-विज्ञान / बायोमिमेटिक रसायन विज्ञान के प्रतिष्ठित फ़ैकल्टी के रूप में भी संयुक्त-नियुक्ति रखते है। डॉ. मयंक कई पेटेंट, शोध पत्र और पुस्तक अध्यायों के लेखक भी हैं। डॉ. मयंक को भारत, अमेरिका, लंदन, कनाडा, जापान, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड से विभिन्न पुरस्कार और मान्यताएं मिली हैं।

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वैश्विक पहचान और वैज्ञानिक उपलब्धियाँ:

डॉ. मयंक की उत्कृष्ट क्षमताओं को कोविड-19 महामारी के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के आप्रवासन सेवाओं द्वारा पहचाना गया था। डॉ. मयंक के वैज्ञानिक योग्यता और शोध कार्य को अमेरिका के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संगठन सिग्मा-षि द्वारा भी मान्यता दी गई है। इनकी वैज्ञानिक अनुसंधान में उत्कृष्ट योगदान के लिए लंदन की रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री द्वारा “चार्टर्ड साइंटिस्ट” के रूप में लंदन के विज्ञान परिषद् में शामिल किया गया है। हाल ही में डॉ. मयंक सिंह को अमेरिका के प्रसिद्ध बायोग्राफिकल डायरेक्टरी (हूज़ हूँ इन अमेरिका) में भी शामिल किया गया है, जो उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक योगदानों को दर्शाता है।

शिक्षा के हर चरण पर मिले मार्गदर्शन के लिए आभार: 

अंत में डॉ. मयंक ने कहा, मैं अपने सभी गुरुओं का हृदय से आभार प्रकट करता हूँ, जिनके मार्गदर्शन और आशीर्वाद ने मेरी यात्रा को दिशा दी। साथ ही, अपने जन्मदाता (माता-पिता) को धन्यवाद देता हूँ, जिन्होंने मुझे अपनी योग्यताओं को निखारने की पूर्ण स्वतंत्रता दी और मेरा समर्थन किया।

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Author: Suryodaya Samachar

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