Varanasi news :- सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के 44वें दीक्षान्त समारोह के अवसर पर उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल ने विश्वविद्यालय परिसर में ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण एवं आधुनिक विकास कार्यों का लोकार्पण किया। लगभग साढ़े चार करोड़ रुपये की लागत से नवीनीकृत लाल भवन, पुरातत्व संग्रहालय तथा शताब्दी भवन अतिथि गृह का उद्घाटन करते हुए उन्होंने विश्वविद्यालय की इस पहल को भारतीय सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक अधोसंरचना के संतुलित विकास का उत्कृष्ट उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि प्राचीन धरोहरों का संरक्षण केवल इतिहास को सुरक्षित रखने का कार्य नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को अपनी सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का सशक्त माध्यम भी है।
ऐतिहासिक भवनों के संरक्षण की सराहना
महामहिम राज्यपाल ने वर्ष 1917 में अंग्रेजों के समय निर्मित ऐतिहासिक लाल भवन तथा वर्ष 1998 में स्थापित शताब्दी भवन अतिथि गृह के जीर्णोद्धार एवं आधुनिकीकरण कार्यों का लोकार्पण किया। इन दोनों परियोजनाओं पर लगभग 4.50 करोड़ रुपये व्यय किए गए हैं। निरीक्षण के दौरान उन्होंने भवनों के मूल स्वरूप को सुरक्षित रखते हुए आधुनिक सुविधाओं के विकास की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय ने विरासत संरक्षण और आधुनिक विकास के बीच उत्कृष्ट संतुलन स्थापित किया है।
पुरातत्व संग्रहालय ने किया प्रभावित
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने विश्वविद्यालय के वर्ष 1950 में स्थापित पुरातत्व संग्रहालय का भी विस्तृत निरीक्षण किया। संग्रहालय में सुरक्षित लगभग सात हजार दुर्लभ पुरावस्तुओं, प्राचीन मूर्तियों, सिक्कों, अभिलेखों तथा ऐतिहासिक धरोहरों को उन्होंने गहरी रुचि के साथ देखा। विशेष रूप से कुषाणकालीन मानव मस्तक की दुर्लभ प्रतिमा ने उनका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने भारतीय संस्कृति और इतिहास से जुड़े इन अनमोल अवशेषों के संरक्षण के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन की सराहना की।
उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आधुनिक तकनीक से विकसित यह संग्रहालय भविष्य में शोधार्थियों, विद्यार्थियों, इतिहासकारों तथा देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों के लिए अध्ययन और अनुसंधान का प्रमुख केन्द्र बनेगा। साथ ही उन्होंने कहा कि ऐसे संग्रहालय भारत की सांस्कृतिक पहचान को विश्व स्तर पर मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षण कार्य की सराहना
इसके बाद महामहिम ने सरस्वती भवन पुस्तकालय का दौरा किया। यहां राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन के अंतर्गत संचालित “ज्ञान भारतम्” परियोजना के माध्यम से दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षण, डिजिटलीकरण एवं दस्तावेजीकरण के कार्यों का अवलोकन किया। विश्वविद्यालय में सुरक्षित सवा लाख से अधिक दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षण कार्य को उन्होंने भारतीय ज्ञान परम्परा की रक्षा की दिशा में अत्यंत महत्वपूर्ण बताया।
राज्यपाल ने कहा कि प्राचीन ग्रंथ केवल धार्मिक या साहित्यिक धरोहर नहीं हैं, बल्कि उनमें भारत के विज्ञान, चिकित्सा, गणित, दर्शन, भाषा और संस्कृति का बहुमूल्य ज्ञान सुरक्षित है। ऐसे में इनका डिजिटलीकरण समय की आवश्यकता है, जिससे आने वाली पीढ़ियां भी इनका अध्ययन कर सकें।
निर्माणाधीन श्रमण विद्या संकाय का किया निरीक्षण
महामहिम ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया के सीएसआर फंड से निर्माणाधीन श्रमण विद्या संकाय के जीर्णोद्धार एवं आधुनिकीकरण कार्यों का भी निरीक्षण किया। उन्होंने निर्माण कार्य की गुणवत्ता और आधुनिक सुविधाओं पर संतोष व्यक्त करते हुए कहा कि इस प्रकार के विकास कार्य विश्वविद्यालय की शैक्षणिक अधोसंरचना को नई मजबूती प्रदान करेंगे। उन्होंने परिसर में संचालित दलाई लामा भवन सहित अन्य विकास कार्यों की भी प्रशंसा की।
भारतीय ज्ञान परम्परा को मिलेगा नया आयाम
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय केवल शिक्षा का केन्द्र नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परम्परा और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण संस्थान है। यहां चल रहे संरक्षण एवं विकास कार्य आने वाले समय में विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाएंगे। उन्होंने कहा कि आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान का समन्वय ही भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
गणमान्य लोग रहे उपस्थित
इस अवसर पर उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय, कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा, कुलसचिव राकेश कुमार, प्रो. जितेन्द्र कुमार, प्रो. राजनाथ, प्रो. दिनेश कुमार गर्ग, डॉ. विशाखा शुक्ला, अभियंता रामविजय सिंह, डॉ. विमल कुमार त्रिपाठी सहित विश्वविद्यालय के अनेक शिक्षक, अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में विरासत संरक्षण और आधुनिक विकास कार्यों का यह प्रयास भारतीय शिक्षा व्यवस्था के लिए प्रेरणादायक माना जा रहा है। पुरातत्व संग्रहालय के आधुनिकीकरण, दुर्लभ पाण्डुलिपियों के संरक्षण, ऐतिहासिक भवनों के जीर्णोद्धार तथा नई अधोसंरचना के निर्माण से विश्वविद्यालय की शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक पहचान और अधिक सशक्त होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे प्रयास भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
📰 रिपोर्टर
सुजीत सिंह
वाराणसी प्रतिनिधि
सूर्योदय समाचार
Author: Suryodaya Samachar
खबर से पहले आप तक






