Varanasi news :- गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर धर्मनगरी काशी पूरी तरह श्रद्धा और भक्ति में डूबी नजर आई। गुरु-शिष्य परंपरा के इस महापर्व पर भगवान अवधूत राम की तपस्थली सहित विभिन्न आश्रमों और मठों में श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ पड़ा। भक्तों ने अपने गुरु का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त किया तथा लोक कल्याण, सुख-समृद्धि और विश्व शांति की कामना की। इस अवसर पर गुरु के बताए मार्ग पर चलने और उनके आदर्शों को जीवन में अपनाने का संकल्प भी लिया गया।
गुरु-शिष्य परंपरा का सनातन संदेश
गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति का ऐसा पर्व है, जो गुरु और शिष्य के पवित्र संबंध को समर्पित है। इस दिन शिष्य अपने गुरु के सानिध्य में पहुंचकर उनका पूजन करते हैं, आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और जीवनभर उनके आदर्शों पर चलने का संकल्प लेते हैं। सनातन परंपरा में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है, क्योंकि वही ज्ञान के माध्यम से जीवन का सही मार्ग दिखाते हैं।
भगवान अवधूत राम की तपस्थली पर उमड़ी आस्था
काशी स्थित परम पूज्य अघोरेश्वर भगवान अवधूत राम की तपस्थली पर गुरु पूर्णिमा के अवसर पर हजारों श्रद्धालु सुबह से ही पहुंचने लगे। भक्तों ने श्रद्धा और विश्वास के साथ गुरु पद पूजा की तथा परिवार की सुख-समृद्धि, समाज के कल्याण और राष्ट्र की उन्नति की कामना की। आश्रम परिसर में पूरे दिन भजन-कीर्तन, पूजन और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ।
लोक कल्याण के लिए समर्पित है आश्रम
भगवान अवधूत राम द्वारा स्थापित पड़ाव स्थित अवधूत राम कुष्ठ सेवा आश्रम वर्षों से मानव सेवा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत कर रहा है। यहां कुष्ठ रोगियों के लिए आधुनिक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। दूर-दराज़ से आने वाले मरीज यहां उपचार प्राप्त करते हैं और स्वस्थ जीवन की ओर अग्रसर होते हैं। आश्रम की सेवा भावना आज भी समाज के लिए प्रेरणा बनी हुई है।
भक्तों ने की विश्व शांति और मानव कल्याण की प्रार्थना
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्रद्धालुओं ने गुरु पद पूजा के साथ लोकमंगल, विश्व शांति, पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण की विशेष प्रार्थना की। श्रद्धालुओं का कहना था कि गुरु के बताए मार्ग पर चलकर ही जीवन को सफल बनाया जा सकता है। गुरु का सानिध्य व्यक्ति को सत्य, सेवा और सदाचार की राह पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है।
गुरु का स्थान सर्वोपरि
भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है। संत कबीर का प्रसिद्ध दोहा आज भी गुरु की महिमा को स्पष्ट करता है—
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
यह दोहा बताता है कि गुरु ही वह माध्यम हैं, जो मनुष्य को ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं। इसलिए गुरु पूर्णिमा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और मानव मूल्यों का जीवंत उत्सव भी है।
📰 रिपोर्टर
सुजीत सिंह
वाराणसी प्रतिनिधि
सूर्योदय समाचार
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Author: Suryodaya Samachar
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