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Health updates :- IIT (BHU) के शोधकर्ताओं ने रक्त के थक्के और थ्रोम्बोसिस को रोकने वाले नैनोकण विकसित किए

रिपोर्टर सुजीत सिंह वाराणसी

Health updates :- स्ट्रोक, हार्ट अटैक, पल्मोनरी एंबोलिज़्म और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस जैसी रक्त के थक्कों से जुड़ी बीमारियाँ विश्वभर में मृत्यु दर के प्रमुख कारणों में शामिल हैं। ये बीमारियाँ अक्सर रक्त में खतरनाक थक्के बनने के कारण होती हैं, जो नसों को अवरुद्ध कर जीवन के लिए गंभीर खतरा उत्पन्न करते हैं। भारत में वेनस थ्रॉम्बोएम्बोलिज़्म (VTE) की वार्षिक दर प्रति 1,000 व्यक्तियों पर 1–2 है, जबकि पल्मोनरी एंबोलिज़्म के मामले 39–115 प्रति लाख और डीप वेन थ्रॉम्बोसिस के मामले 53–162 प्रति लाख तक दर्ज किए गए हैं।

इस गंभीर स्वास्थ्य चुनौती का समाधान प्रस्तुत करते हुए, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (बीएचयू), वाराणसी के स्कूल ऑफ बायोमेडिकल इंजीनियरिंग के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुदीप मुखर्जी के नेतृत्व में एक शोध टीम ने पोटैशियम फेरिक ऑक्सालेट नैनोकण (KFeOx-NPs) नामक एक नवीन सामग्री विकसित की है जो रक्त के थक्के बनने और घनास्त्रता (थ्रोम्बोसिस) को प्रभावी रूप से रोकती है वह भी रक्त की संरचना या गुणों को बदले बिना।

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जहाँ पारंपरिक रक्त पतला करने वाली दवाएँ जैसे वारफारिन और हेपरिन थक्कों के उपचार या रोकथाम में प्रयुक्त होती हैं वहीं इनके कई दुष्प्रभाव भी देखे जाते हैं जैसे अत्यधिक रक्तस्राव, हड्डियों की कमजोरी, और संभावित जन्म दोष। इसी तरह, प्रयोगशालाओं में रक्त संग्रह के लिए प्रयुक्त रसायन जैसे EDTA और सोडियम साइट्रेट समय के साथ रक्त कोशिकाओं की संरचना को प्रभावित करते हैं, जिससे जांच की सटीकता पर असर पड़ता है।

आईआईटी (बीएचयू) द्वारा विकसित KFeOx-NPs एक आशाजनक विकल्प के रूप में उभरकर सामने आए हैं। मानव रक्त नमूनों पर किए गए परीक्षण में यह सामग्री 48 घंटे तक रक्त के थक्के बनने से रोकने में सफल रही, और इस दौरान रक्त कोशिकाओं की आकृति, आकार या संरचना पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा। इसके अतिरिक्त, चूहे के मॉडल में किए गए परीक्षणों में भी इस सामग्री ने घनास्त्रता (थ्रोम्बोसिस) की प्रभावी रोकथाम प्रदर्शित किया है ।

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इस शोध कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका ACS Applied Materials & Interfaces (ACS AMI) में प्रकाशित किया गया है, जो इसकी वैज्ञानिक गुणवत्ता और वैश्विक महत्त्व को दर्शाता है। साथ ही, इस खोज के लिए एक पेटेंट भी फाइल किया गया है, जिससे भविष्य में इसके चिकित्सकीय अनुप्रयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।

डॉ. सुदीप मुखर्जी ने बताया कि यह नैनोमैटेरियल रक्त संबंधी रोगों की रोकथाम और निदान के लिए एक सुरक्षित और अधिक प्रभावी विकल्प प्रदान करता है। यह वर्तमान में प्रयुक्त एंटीकोआगुलेंट्स की सीमाओं को भी दूर करता है।

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Author: Suryodaya Samachar

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