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भाद्रपद पूर्णिमा और प्रतिपदा श्राद्ध आज :- आज से शुरू हो रहे पितृ पक्ष, जानिए कौन कर सकता है श्राद्ध और पूजन की पूरी विधि

भाद्रपद पूर्णिमा और प्रतिपदा श्राद्ध आज :- आज भाद्रपद की पूर्णिमा (18 सितंबर) से पितृ पक्ष शुरू हो गया है। हाँ, आज 18 सितंबर से पितृ पक्ष की शुरुआत हो गई है, जो 2 अक्टूबर 2024 को सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या तक चलेगा। यह अवधि पितरों को याद करने और उनका श्राद्ध करने के लिए मानी जाती है। इस वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा और आश्विन कृष्ण की प्रतिपदा एक ही दिन पड़ रही है, इसलिए प्रतिपदा का श्राद्ध भी आज ही किया जा सकता है। पितृ पक्ष के दौरान, परंपरानुसार अपने पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान जैसे कर्म किए जाते हैं।

पितरों को याद करने का ये पर्व 2 अक्टूबर (सर्व पितृ मोक्ष अमावस्या) तक रहेगा। इस साल भाद्रपद पूर्णिमा और आश्विन कृष्ण की प्रतिपदा आज ही है। इसलिए पितृ पक्ष की प्रतिपदा का श्राद्ध आज करें।

पितृ पक्ष की शुरुआत पर जानिए पितर कौन होते हैं? पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष क्यों कहते हैं? इन दिनों में कौन-कौन से शुभ काम करें? किस दिन किसका श्राद्ध करना चाहिए? और घर पर श्राद्ध करने की विधि…

जानिए कौन होते हैं पितर देव :- 

  • घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर देव माना जाता है।
  • श्रीमद् भगवद्गीता के 10वें अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि नागों में शेषनाग और जल- जंतुओं का अधिपति वरुण मैं ही हूं। पितरों में अर्यमा और शासन करने वालों में यमराज मैं ही हूं।
  • अर्यमा पितरों के राजा का नाम है। अर्यमा ऋषि कश्यप और अदिति के तीसरे पुत्र हैं। यमराज मृत्यु के देवता हैं।
  • पितृ पक्ष में अर्यमा पितर देव की पूजा की जाती है।
  • एक मान्यता ये है कि सबसे पहले ब्रह्मा जी के पीठ से पितर देव उत्पन्न हुए थे।

जानिए क्यों पितर पक्ष को कहा जाता है श्राद्ध पक्ष :- 

घर-परिवार के मृत लोगों को पितर माना जाता है। पितृ पक्ष (आश्विन मास के कृष्ण पक्ष) में पितरों को श्रद्धापूर्वक याद करते हुए पिंडदान, तर्पण और धूप-ध्यान करते हैं। इसी वजह से पितृ पक्ष को श्राद्ध पक्ष भी कहते हैं।

पितृ लोक कहां है?

पितृ लोक से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार पितृ लोक चंद्र पर है। पृथ्वी से चंद्रमा का जो भाग दिखाई नहीं देता है, उस हिस्से में पितर देवता रहते हैं। पितृ लोक और यम लोक दक्षिण दिशा में हैं, ऐसी मान्यता है।

शास्त्रों में इंसानों के लिए तीन ऋण बताए गए हैं। (पूर्णिमा का श्राद्ध कब करना चाहिए)

देव ऋण- भगवान विष्णु और अन्य देवी-देवताओं की पूजा से उतरता है।

ऋषि ऋण- शिव पूजा और दान-पुण्य करने से उतरता है।

पितृ ऋण- पितृ पक्ष में पितरों के लिए श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण करने से उतरता है।

घर-परिवार के मृत सदस्यों यानी पितरों की आत्म शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राब्द, पिंडदान और तर्पण किया जाता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष में घर-परिवार के पितर देव अपने वंशजों को देखने के लिए धरती पर आते हैं और हमारे द्वारा किए गए श्राध्द से तृप्त होकर लौट जाते हैं, इसलिए इन दिनों में पितरों की तृप्ति के लिए तर्पण, पिंडदान करने की परंपरा है।

जब सूर्य कन्या राशि में रहता है, तब पितरों को तृप्त करने वाली चीजें देने से स्वर्ग मिलता है।

अथर्ववेद –पितृ पक्ष में पितरों के लिए विशेष पूजा और दान करना चाहिए।

जानिए कौन कर सकता है श्राध्द(भाद्रपद पौर्णिमा):-

  • किसी मृत व्यक्ति का कोई पुत्र न हो तो भाई- भतीजे, माता के कुल के लोग यानी मामा या ममेरा भाई या शिष्य श्राद्ध कर सकते हैं। इनमें से कोई भी न हो तो कुल पुरोहित या गुरु श्राध्द कर सकते हैं।
  • पिता के लिए श्राद्ध, पिंड दान और जल-तर्पण पुत्र को करना चाहिए। पुत्र न हो तो पत्नी करें और पत्नी भी न हो तो सगा भाई श्राद्ध कर सकता है।
  • मृत व्यक्ति के पुत्र, पौत्र, भाई की संतान श्राध्द कर सकते हैं।
  • किसी मृत व्यक्ति का पुत्र न हो तो उसकी बेटी का पुत्र भी श्राध्द कर सकता है।
  • माता-पिता कुंवारी मृत कन्या का श्राद्ध कर सकते हैं। शादीशुदा मृत बेटी के परिवार में कोई श्राध्द करने वाला न हो तो उसका पिता श्राध्द कर सकता है।
  • बेटी का बेटा और नाना एक-दूसरे के लिए कर सकते हैं। दामाद और ससुर भी एक-दूसरे के लिए श्राद्ध कर सकते हैं। बहू अपनी मृत सास के लिए श्राध्द कर सकती है।

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घर पर ही श्राद्ध और तर्पण करने की विधि (भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा)

  • श्राध्द करने की तिथि पर सुबह जल्दी उठें और नहाने के बाद पितरों की तृप्ति के लिए श्राद्ध और दान करने का संकल्प लें।
  • दोपहर में करीब 12 बजे दक्षिण दिशा में मुंह करके बाएं पैर को मोड़कर, घुटने को जमीन पर टिका कर बैठें।
  • तांबे के चौड़े बर्तन में जौ, तिल, चावल गाय का कच्चा दूध, गंगाजल, सफेद फूल और पानी डालें।
  • हाथ में कुशा घास रखें और उस जल को हाथों में भरकर सीधे हाथ के अंगूठे से उसी बर्तन में गिराएं। इस तरह 11 बार पितरों का ध्यान करते हुए तर्पण करें।
  • गाय के गोबर से बना कंडा जलाएं। कंडों से जब धुआं निकलना बंद हो जाए, तब अंगारों पर गुड़, घी और थोड़ी-थोड़ी खीर-पूरी अर्पित करें।
  • हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों का ध्यान करते हुए जमीन पर अर्पित करें।
  • इसके बाद देवता, गाय, कुत्ते, कौए और चींटी के लिए अलग से भोजन निकाल लें।
  • जरूरतमंद लोगों को भोजन कराएं। दान-दक्षिणा दें।

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Author: Suryodaya Samachar

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