Varanasi news: भारतीय ज्ञान परम्परा, संस्कृत संस्कृति और अकादमिक उत्कृष्टता के गौरवशाली संगम का साक्षी बनने जा रहा सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय 29 जुलाई 2026 को अपना 44वाँ दीक्षान्त महोत्सव आयोजित करेगा। विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक मुख्य भवन में होने वाले इस भव्य समारोह में 11,958 विद्यार्थियों को विभिन्न उपाधियाँ एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाएंगे, जबकि 29 मेधावी छात्र-छात्राओं को 51 स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया जाएगा। समारोह की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल करेंगी।
संस्कृत, संस्कृति और शिक्षा का ऐतिहासिक उत्सव
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय का 44वाँ दीक्षान्त महोत्सव केवल डिग्री वितरण का कार्यक्रम नहीं होगा, बल्कि भारतीय संस्कृति, ज्ञान परम्परा और आधुनिक शिक्षा के समन्वय का एक भव्य उत्सव भी बनेगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार इस वर्ष का समारोह भारतीय संस्कृति की समृद्ध विरासत और विकसित भारत-2047 के संकल्प को समर्पित रहेगा। समारोह में देशभर के विद्वान, शिक्षाविद, शोधकर्ता, विद्यार्थी एवं विभिन्न क्षेत्रों के गणमान्य लोग शामिल होंगे।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि समारोह में विद्यार्थियों को केवल उपाधियाँ ही नहीं दी जाएंगी, बल्कि उन्हें भारतीय ज्ञान परम्परा, अनुसंधान, नवाचार और राष्ट्र निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश भी दिया जाएगा। इस आयोजन को विश्वविद्यालय के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण दीक्षान्त समारोहों में शामिल माना जा रहा है।
महामहिम राज्यपाल करेंगी अध्यक्षता
29 जुलाई को प्रातः 9 बजे विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक मुख्य भवन में आयोजित होने वाले इस समारोह की अध्यक्षता उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं विश्वविद्यालय की कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल करेंगी। वहीं मुख्य अतिथि के रूप में देश के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक, शिक्षाविद एवं पद्मश्री सम्मानित प्रोफेसर आशुतोष शर्मा उपस्थित रहेंगे।
समारोह में उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री योगेन्द्र उपाध्याय तथा उच्च शिक्षा राज्य मंत्री रजनी तिवारी विशिष्ट अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। कुलपति प्रो. बिहारी लाल शर्मा विश्वविद्यालय की वार्षिक उपलब्धियों का प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे जबकि कुलसचिव राकेश कुमार समारोह की औपचारिक कार्यवाही सम्पन्न कराएंगे।
235 वर्षों की गौरवशाली विरासत
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय भारतीय शिक्षा जगत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित संस्थानों में गिना जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1791 में संस्कृत महाविद्यालय के रूप में हुई थी। इसके बाद वर्ष 1958 में इसे वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय का स्वरूप मिला और वर्ष 1973 में इसका नाम सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय रखा गया।
लगभग ढाई शताब्दी की इस गौरवशाली यात्रा में विश्वविद्यालय ने संस्कृत भाषा, भारतीय दर्शन, वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य, आयुर्वेद एवं भारतीय ज्ञान परम्परा के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। वर्तमान समय में उत्तर प्रदेश के अलावा दिल्ली, राजस्थान, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, सिक्किम तथा उत्तराखण्ड सहित अनेक राज्यों के विद्यार्थी यहां अध्ययन कर रहे हैं।
करीब 12 हजार विद्यार्थियों को मिलेंगी उपाधियाँ
इस वर्ष विश्वविद्यालय की विभिन्न परीक्षाओं में सफल कुल 11,958 विद्यार्थियों को उपाधियाँ एवं प्रमाण-पत्र प्रदान किए जाएंगे। इनमें प्रथम, पूर्व मध्यमा, उत्तर मध्यमा, शास्त्री, आचार्य, शिक्षाशास्त्री, संस्कृत प्रमाणपत्रीय, आयुर्वेदाचार्य तथा विद्यावारिधि जैसी प्रतिष्ठित उपाधियाँ शामिल हैं।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने बताया कि डिजिटल इंडिया अभियान को बढ़ावा देते हुए सभी विद्यार्थियों को उनकी उपाधियाँ एवं प्रमाण-पत्र डीजी लॉकर के माध्यम से भी उपलब्ध कराए जाएंगे। इससे विद्यार्थियों को भविष्य में किसी भी सरकारी या निजी संस्था में अपने प्रमाण-पत्रों का उपयोग करने में सुविधा मिलेगी।
29 मेधावियों को मिलेंगे 51 स्वर्ण पदक
समारोह का सबसे आकर्षक क्षण मेधावी विद्यार्थियों का सम्मान होगा। विश्वविद्यालय की विभिन्न परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने वाले कुल 29 छात्र-छात्राओं को 51 स्वर्ण पदकों से सम्मानित किया जाएगा। इनमें 17 छात्रों को 35 स्वर्ण पदक तथा 12 छात्राओं को 16 स्वर्ण पदक प्रदान किए जाएंगे। विश्वविद्यालय का मानना है कि यह सम्मान विद्यार्थियों को शिक्षा और शोध के क्षेत्र में नई ऊँचाइयों तक पहुँचने के लिए प्रेरित करेगा।
महामहिम राज्यपाल उत्कृष्ट अध्यापकों को करेंगी सम्मानित
44वें दीक्षान्त महोत्सव का एक विशेष आकर्षण उत्कृष्ट अध्यापकों का सम्मान भी होगा। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार उत्तर प्रदेश की राज्यपाल एवं कुलाधिपति श्रीमती आनंदीबेन पटेल चार विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों के क्रमशः एक एवं तीन उत्कृष्ट अध्यापकों को उनके उत्कृष्ट शैक्षणिक योगदान, शोध कार्य, नवाचार तथा अकादमिक उपलब्धियों के लिए सम्मानित करेंगी। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण को बढ़ावा देने की दिशा में यह पहल बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
मुख्य अतिथि होंगे पद्मश्री प्रो. आशुतोष शर्मा
समारोह के मुख्य अतिथि भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक एवं शिक्षाविद पद्मश्री प्रो. आशुतोष शर्मा होंगे। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर से रासायनिक अभियांत्रिकी की शिक्षा प्राप्त की तथा अमेरिका के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शोध कार्य किया। वे लंबे समय तक आईआईटी कानपुर में प्रोफेसर रहे और भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के सचिव के रूप में देश में वैज्ञानिक अनुसंधान एवं नवाचार को नई दिशा प्रदान की।
वर्तमान में वे आईआईटी कानपुर में इंस्टीट्यूट चेयर प्रोफेसर तथा भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी (INSA) के अध्यक्ष के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। विज्ञान एवं अनुसंधान के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार, इन्फोसिस पुरस्कार, यूरेका पुरस्कार सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। वर्ष 2025 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से अलंकृत किया।
संस्कृति और परंपरा का भव्य संगम
दीक्षान्त महोत्सव केवल शैक्षणिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की झलक भी प्रस्तुत करेगा। समारोह में विश्वविद्यालय की उपलब्धियों पर आधारित एक विशेष लघु वृत्तचित्र का प्रदर्शन किया जाएगा। इसके अलावा लोकगीत, लोकनृत्य एवं भारतीय सांस्कृतिक विरासत पर आधारित आकर्षक प्रस्तुतियाँ समारोह को और अधिक भव्य एवं यादगार बनाएंगी।
‘विकसित भारत-2047’ के संकल्प को समर्पित है इस वर्ष की थीम
इस वर्ष के दीक्षान्त महोत्सव की थीम “संस्कृत एवं भारतीय ज्ञान परम्परा : विकसित भारत-2047 का वैचारिक अधिष्ठान” निर्धारित की गई है। विश्वविद्यालय का मानना है कि संस्कृत केवल एक प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता, संस्कृति, विज्ञान, दर्शन और ज्ञान-विज्ञान की मूल आधारशिला है। विकसित भारत-2047 के निर्माण में भारतीय ज्ञान परंपरा की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी और विश्वविद्यालय इसी विचार को आगे बढ़ाने का कार्य कर रहा है।
राष्ट्र निर्माण में संस्कृत शिक्षा की महत्वपूर्ण भूमिका
सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय पिछले कई दशकों से भारतीय संस्कृति, संस्कृत भाषा, आयुर्वेद, वेद, योग, दर्शन, ज्योतिष तथा अन्य पारंपरिक विद्याओं के संरक्षण और संवर्धन में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। विश्वविद्यालय का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि ऐसे विद्वानों का निर्माण करना है जो भारतीय संस्कृति और ज्ञान परम्परा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिला सकें।
विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि आधुनिक तकनीक और प्राचीन ज्ञान का समन्वय ही भविष्य के भारत की सबसे बड़ी शक्ति बनेगा। इसी सोच के साथ विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, शोध और नवाचार के लिए निरंतर प्रेरित किया जा रहा है।
शिक्षा, संस्कृति और गौरव का ऐतिहासिक आयोजन
29 जुलाई को आयोजित होने वाला 44वाँ दीक्षान्त महोत्सव सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के इतिहास का एक यादगार अध्याय साबित होगा। हजारों विद्यार्थियों को उपाधियाँ, मेधावियों को स्वर्ण पदक, उत्कृष्ट अध्यापकों का सम्मान तथा भारतीय संस्कृति की भव्य प्रस्तुति इस समारोह को विशेष बनाएगी। विश्वविद्यालय प्रशासन को विश्वास है कि यह आयोजन विद्यार्थियों के उज्ज्वल भविष्य के साथ-साथ भारतीय ज्ञान परम्परा के वैश्विक विस्तार की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा।
रिपोर्टर
सुजीत सिंह
वाराणसी प्रतिनिधि
सूर्योदय समाचार नेटवर्क
Author: Suryodaya Samachar
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