
NISAR Satelite :- नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ और ग्लेशियर-जनित आपदा के बाद भारत-अमेरिका के NISAR (NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar) सैटेलाइट को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह मिशन धरती, बर्फ और प्राकृतिक आपदाओं में होने वाले बदलावों की निगरानी के लिए बनाया गया है। ताजा रिपोर्टों में सवाल उठाया गया है कि इतनी बड़ी हिमालयी घटना से पहले NISAR की ओर से कोई सार्वजनिक चेतावनी क्यों सामने नहीं आई।
NISAR से क्यों थीं इतनी उम्मीदें?
NISAR को NASA और ISRO ने मिलकर विकसित किया है। इसमें रडार तकनीक का इस्तेमाल होता है, जो बादलों और अंधेरे के बावजूद धरती की सतह में होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड कर सकती है। इसे भूस्खलन, ग्लेशियर और बर्फ में बदलाव समेत कई प्राकृतिक खतरों की निगरानी के लिए महत्वपूर्ण मिशन माना जाता है।
फिर नेपाल आपदा में अलर्ट क्यों नहीं मिला?
यही सवाल अब चर्चा में है। कुछ विशेषज्ञों और रिपोर्टों ने कहा है कि नेपाल की इस घटना से पहले NISAR की ओर से कोई प्रभावी चेतावनी उपलब्ध नहीं थी। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सैटेलाइट ‘फेल’ हो गया।
नेपाल में हुई घटना सामान्य बारिश से पैदा हुई बाढ़ नहीं थी। शुरुआती वैज्ञानिक विश्लेषण के मुताबिक ग्लेशियर और चट्टान के बड़े हिस्से के अचानक ढहने से भारी मलबा और पानी नीचे की ओर आया, जिसने कुछ ही समय में विनाशकारी फ्लैश फ्लड का रूप ले लिया। ऐसे अचानक होने वाले हादसे की भविष्यवाणी बेहद चुनौतीपूर्ण होती है।
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सैटेलाइट तस्वीर और ‘अलर्ट’ में फर्क
किसी सैटेलाइट का किसी क्षेत्र की तस्वीर लेना और उससे वास्तविक समय में लोगों को बाढ़ की चेतावनी देना दो अलग-अलग चीजें हैं। शुरुआती चेतावनी के लिए सैटेलाइट के अलावा जमीन पर लगे सेंसर, नदी के जलस्तर की निगरानी, मौसम संबंधी डेटा और स्थानीय अलर्ट सिस्टम भी जरूरी होते हैं।
रिपोर्टों के मुताबिक इस आपदा में पारंपरिक बाढ़ चेतावनी प्रणाली भी सीमित साबित हुई, क्योंकि यह घटना अचानक ग्लेशियर-चट्टान के ढहने से शुरू हुई थी।
क्या NISAR ने कोई संकेत पकड़े थे?
एक ताजा रिपोर्ट में दावा किया गया है कि NISAR के रडार डेटा ने आपदा से पहले उस इलाके में जमीन की हलचल के संकेत पकड़े थे। अगर इस दावे की आगे वैज्ञानिक पुष्टि होती है, तो यह सवाल और महत्वपूर्ण हो जाएगा कि इन संकेतों को समय रहते आपदा चेतावनी में क्यों नहीं बदला जा सका।
असली चुनौती सिर्फ NISAR नहीं
नेपाल की इस त्रासदी ने यह भी दिखाया है कि हिमालयी इलाकों में सिर्फ एक सैटेलाइट पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। वैज्ञानिक बेहतर रियल-टाइम निगरानी, सेंसर नेटवर्क, सैटेलाइट डेटा शेयरिंग और स्थानीय चेतावनी व्यवस्था की जरूरत पर जोर दे रहे हैं। नेपाल ने चीन के साथ भी आपदा संबंधी डेटा और शुरुआती चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने की जरूरत उठाई है।
निष्कर्ष: NISAR से जुड़े सवाल गंभीर हैं, लेकिन अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सैटेलाइट ने चेतावनी देने में ‘नाकामी’ दिखाई। पहले यह स्पष्ट होना जरूरी है कि आपदा से पहले NISAR ने वास्तव में कौन-सा डेटा रिकॉर्ड किया, वह डेटा कब उपलब्ध हुआ और उसे चेतावनी प्रणाली में इस्तेमाल किया गया या नहीं।
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Author: Suryodaya Samachar
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