बड़ी खबर
Commonwealth Games 2026 :- कॉमनवेल्थ गेम्स में MP की बेटी यामिनी ने जीता सिल्वर, अजय गोल्ड से चूके Ebola Virus :- DR कांगो में तेजी से फैल रहा इबोला, WHO ने जारी की वैश्विक चेतावनी; अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की अपील Petrol-Diesel Price Today: 2 अगस्त को बदले ईंधन के दाम, जानिए आपके शहर में पेट्रोल-डीजल हुआ सस्ता या महंगा India Post :- रक्षाबंधन पर भारतीय डाक का खास तोहफा, 24-48 घंटे में पहुंचेगी राखी; पार्सल और डॉक्यूमेंट नियमों में भी बदलाव Patna University :- पटना यूनिवर्सिटी LLB प्रवेश परीक्षा का प्रश्नपत्र वायरल, मोबाइल से फोटो खींचकर किया लीक; परीक्षा रद्द नहीं होगी Indore News :- भोलेनाथ पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी से इंदौर में बवाल, कांवड़ियों ने थाना घेरा; मौलाना पर FIR की मांग

Home » धर्म » भगवान् को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या आवश्यक है? कैसे मिलेंगे भगवान्…

भगवान् को प्राप्त करने के लिए क्या-क्या आवश्यक है? कैसे मिलेंगे भगवान्…

भगवान् को प्राप्त करनेके लिए आवश्यक है –

उत्कट चाह

भगवान्‌ को प्राप्त करना हो तो भगवान्‌ को प्राप्त करने की हृदयमें चाह पैदा करें। वह चाह आग बन जाय। यह आलंकारिक भाषा नहीं है, चीज ही ऐसी है। भगवान्  की चाह, वह आग बन जाती है जो अन्य समस्त चाहों-इच्छाओं को जला देती है। यदि जलाती नहीं है तो भगवान् की चाह नहीं है। यह कसौटी है। जगत् से नाता तोड़ना नहीं पड़ता, स्वतः टूट जाता है। उनकी चाह अन्य किसी चाह को बर्दाश्त नहीं करती। यह दूसरी किसी चाह को भगा देती है। तुलसीदासजी ने कहा है- माया खलु नर्त

अर्थात् भक्तिके सामने माया रह नहीं सकती है। भक्ति पटरानी है और माया नर्तकी है। बेचारी माया तभी तक मोहती है, नचाती है जब तक है भक्तिदेवी नहीं आती हैं। भगवान्‌ की साक्षात् पटरानी भक्तिदेवी आ गयीं तब माया चली जाती है।

अगर जगत् की चाह मन में है तो भगवान्‌ की चाह पैदा होगी ही नहीं। यह कसौटी है। भगवान् मिलें कैसे? हमने भजन चाहा ही कब ? हमने भजन किया कब ? हमने तो भोगों का भजन किया। हमने भगवान् की चाह के साथ-साथ भोगों की चाह रखी। यह व्यभिचारी चाह है। यह तो भगवान् के नाम पर किसी सुख की चाह है, किसी इन्द्रियविलास की चाह है, किसी भोग की चाह है, किसी कामना की चाह है, किसी स्वर्ग की चाह है, किसी सद्‌गति की चाह है। तुलसीदासजी कहते हैं –

चहौं न सुगति, सुमति, संपति कछु, रिधि-सिधि बिपुल बड़ाई।
हेतु-रहित अनुराग राम-पद, बढ़े अनुदिन अधिकाई ॥

अर्थात् न सद्गति चाहिये, न सम्पत्ति चाहिये  न ऋद्धि- सिद्धि और न ही विपुल बड़ाई चाहिये। हमें तो चाहिये दिनों दिन बढ़नेवाला हेतुरहित भगवान् राघवेन्द्र के चरण-कमलों में अनुराग। यह चाह जब रहेगी तब अन्य सभी चाह मिट जायगी।

अतएव भगवान् की प्राप्ति में, भगवान् के प्रेम की प्राप्ति में, भगवान्‌ के भजन की प्राप्ति में जो कुछ विलम्ब है, वह हमारी चाह का विलम्ब है। हमारे मन में जिस दिन, जिस क्षण भगवान्‌ को प्राप्त करने की उत्कट चाह पैदा हो जायगी, उस समय हम भगवान् के बिना नहीं रह सकेंगे और भगवान् भी उस समय हमारे बिना नहीं रह सकेंगे।

मैं, मैं हूं ! भीतर के मैं का मिटना क्यों जरुरी है?…

🙏🙏🙏

Suryodaya Samachar
Author: Suryodaya Samachar

खबर से पहले आप तक

Leave a Comment

Live Cricket

ट्रेंडिंग