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World environment Day :- भारतीय आयुर्वेद और नैनो-प्रौद्योगिकी से वैश्विक चिकित्सा में क्रांति

World environment Day :- औषधि विज्ञान में उत्कृष्ट योगदान देने वाले भारतीय मूल के वैज्ञानिक डॉ. मयंक सिंह ने मिशिगन-संयुक्त राज्य अमरीका स्थित ‘नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर’ में निदेशक के पद पर कार्य करते हुए अपने टीम के साथ मिलकर एक ऐसी नैनो-औषधीय प्रणाली विकसित की है जो लिवर कैंसर के इलाज को नई दिशा दे सकती है। यह शोध कार्य प्राकृतिक पदार्थ-पेक्टिन के उपयोग से जुड़ा है। पेक्टिन एक घुलनशील फाइबर है, जो आमतौर पर फलों की त्वचा (विशेषकर सेब, नींबू एवं, साइट्रस फल) से प्राप्त किया जाता है और लंबे समय से आयुर्वेद तथा आधुनिक पोषण विज्ञान में पाचन सुधारक, डिटॉक्सीफायर और सूजनरोधी एजेंट के रूप में जाना जाता है। 

डॉ. मयंक और उनकी टीम ने पेक्टिन का उपयोग कर गोल्ड नैनोपार्टिकल्स तैयार किए, वह भी पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से, बिना किसी हानिकारक रसायन के। पेक्टिन सिर्फ एक फाइबर नहीं है, बल्कि इसमें यह अनोखी ताकत है कि यह दवा को सीधे लिवर तक पहुंचाने में मदद करता है। यानी दवा सिर्फ वहीं काम करेगी जहां ज़रूरत है और शरीर के बाकी हिस्सों को बिना नुकसान पहुँचाए। इसमें डॉक्सोरुबिसिन जैसी शक्तिशाली कैंसर-रोधी दवा का उपयोग कर पेक्टिन बेस्ड गोल्ड नैनोपार्टिकल्स पर लोड किया गया।

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इस प्रणाली ने प्री-क्लिनिकल परीक्षणों में यह सिद्ध किया कि यह सीधे लिवर में पहुंचकर दवा का लक्ष्य निर्धारण करती है, जिससे सामान्य कोशिकाएं सुरक्षित रहती हैं और साइड इफेक्ट्स कम होते हैं। डॉ. मयंक बताते हैं, “हमारी यह दवा प्रणाली ठीक उसी तरह काम करती है जैसे किसी मरीज के लिए बुलाई गई एंबुलेंस, जो सीधा उस स्थान पर पहुंचती है जहां जरूरत है। इसी तरह, यह पेक्टिन-आधारित गोल्ड नैनोपार्टिकल्स दवा को सीधे लिवर कोशिकाओं तक पहुंचाता है, बिना शरीर के बाकी हिस्सों को प्रभावित किए ।”

• भविष्य की दिशा:

इस तकनीक का आगे चलकर लिवर फाइब्रोसिस, हेपेटाइटिस, नॉन-अल्कोहोलिक फैटी लिवर डिज़ीज़ और अन्य लिवर डिसऑर्डर्स के इलाज में भी उपयोग संभव है। टीम अब इन-विवो बायोडिस्ट्रिब्यूशन की दिशा में कार्य कर रही है।

• अमेरिका में विशेष अनुसंधान कार्यक्रम के अंतर्गत:

यह कार्य संयुक्त रूप से दो प्रमुख अनुसंधान संस्थानों में सम्पन्न किया गया-एक ओर प्रधान वैज्ञानिक (डॉ.) मयंक सिंह के नेतृत्व में “मिशिगन स्थित- नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर” और दूसरी ओर प्रोफेसर (डॉ.) अभय चौहान के पर्यवेक्षण में “मिलवॉकी स्थित-मेडिकल कॉलेज ऑफ विस्कॉन्सिन” । यह शोध अमेरिका द्वारा एक खास कार्यक्रम के अंतर्गत किया गया, जिसे क्लीनिकल एंड ट्रांसलेशनल साइंस इंस्टीट्यूट (सी.टी.एस.आई.) नामक संस्थान द्वारा चलाया जाता है। जिसमें हर साल अमेरिका के अलग-अलग समुदायों से चुने गए होनहार विद्यार्थियों को वैज्ञानिक रिसर्च में काम करने का मौका दिया जाता है।

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• युवा शोधार्थियों की सक्रिय भागीदारी:

इस शोध में चार युवा शोधार्थी छात्र: “सोफिया शुल्ते, रोहित कुमार, शिल्पा कुमार और स्वाती सिंह” ने प्रयोगशाला में सक्रिय रूप से काम किया।

• कार्यक्रम का उद्देश्य:

इस कार्यक्रम का मकसद अलग-अलग पृष्ठभूमि से आए छात्र–छात्राओं को वास्तविक विज्ञान प्रयोगशालाओं का अनुभव करना और उन्हें स्वास्थ्य और चिकित्सा विज्ञान में नई खोजों की ओर प्रेरित करना हैं। इस प्रोजेक्ट के ज़रिए न केवल छात्रों को नैनोमेडिसिन जैसे उन्नत विषय में काम करने का मौका मिला, बल्कि इस सहयोग ने भारत के पारंपरिक आयुर्वेदिक ज्ञान और आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच सेतु बनाते हुए वैश्विक मंच पर एक संतुलित वैज्ञानिक संवाद को बढ़ावा दिया।

• भारतीय आयुर्वेद और नैनोटेक्नोलॉजी विज्ञान:

डॉ. मयंक का मानना है कि यह खोज भारत की आयुर्वेद परंपरा से प्रेरित है। “हमारे ऋषियों ने हजारों साल पहले बताया था कि सोना, लोहा, तांबा, जैसी धातुओं का उपयोग आयुर्वेद में भस्म के रूप में किया जाता रहा है, और आज भी इन धातुओं को औषधीय भस्म के रूप में वैज्ञानिक दृष्टिकोण से गहराई से खोजा और परखा जा रहा है। हमने उसी ज्ञान को विज्ञान से जोड़कर यह नतीजा निकाला है। वे कहते हैं: भारत की आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति में स्वर्ण भस्म का उपयोग हजारों वर्षों से किया जाता रहा है। आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार, शुद्ध किए गए सूक्ष्म कण (भस्म) शरीर की कोशिकाओं में गहराई तक पहुंचकर उपचार करते हैं। यह विचार आधुनिक नैनोटेक्नोलॉजी और नैनोमेडिसिन के समानांतर है, जहाँ 1-100 नैनोमीटर आकार के कण दवाओं को लक्षित स्थान तक ले जाते हैं। आधुनिक विज्ञान अब प्रमाणित कर रहा है कि पारंपरिक आयुर्वेदिक भस्म वास्तव में नैनोकणों के रूप में कार्य करते हैं, अर्थात् भारत सदियों पहले से “प्राकृतिक नैनोमेडिसिन” का उपयोग कर रहा था। यह खोज न सिर्फ चिकित्सा के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि है, बल्कि यह भारत की ज्ञान परंपरा और वैज्ञानिक सोच की ताकत को भी पूरी दुनिया के सामने रखती है।

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टेलीफोनिक कॉल पर बात करते हुए डॉ. मयंक ने कहा कि “आयुर्वेद भारत की बौद्धिक परिपक्वता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का परिणाम है। यह केवल चिकित्सा नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता का जीवनदर्शन है-जहाँ स्वास्थ्य केवल शरीर की अवस्था नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आध्यात्मिक संतुलन है। डॉ. मयंक का मानना है कि “जिस प्रकार गंगा भारत की आत्मा का प्रतीक है, उसी प्रकार आयुर्वेद उसकी बुद्धि और चेतना की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति है।”

• आयुर्वेदिक भस्म और आधुनिक नैनोपार्टिकल्स: एक तुलनात्मक दृष्टिकोण

सोना एक चमकदार पीली धातु है, जो सीधे शरीर में काम नहीं करती क्योंकि यह घुलती नहीं। आयुर्वेद में, इसे जड़ी-बूटियों वाली रसों में पकाकर इतना महीन बना दिया जाता है कि वह भस्म बनकर शरीर में घुल जाती है और दवा की तरह काम करती है। वहीं वैज्ञानिक तरीके से, जब सोने को बहुत छोटे कणों (1–100 nm) में बदला जाता है, तो वे नैनोपार्टिकल्स बनते हैं जो शरीर के किसी खास हिस्से जैसे लिवर या कैंसर कोशिकाओं तक सीधे दवा पहुंचाने का काम करते हैं।

• रसायन-मुक्त तकनीक (ग्रीन नैनोटेक्नोलॉजी):

गोल्ड नैनोपार्टिकल्स तरल अवस्था में होते हैं और इनका रंग अक्सर गहरा रूबी लाल होता है। यह रंग इनके कणों के आकार और प्रकाश को परावर्तित करने की क्षमता पर निर्भर करता है। यही खासियत इन्हें आसानी से पहचानने लायक बनाती है और इन्हें औषधि वितरण, बायोसेंसिंग और इमेजिंग जैसे प्रयोगों के लिए उपयुक्त बनाती है।

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डॉ. मयंक और उनकी टीम द्वारा विकसित पेक्टिन-आधारित गोल्ड नैनोपार्टिकल्स पारंपरिक रासायनिक विधियों की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित, स्वच्छ और प्राकृतिक है। जहां आमतौर पर नैनोकण बनाने के लिए अन्य रासायनिक सामग्रियों का उपयोग किया जाता है-जो शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए हानिकारक हो सकते हैं । वहीं इस नई विधि में फल और पौधों से प्राप्त पेक्टिन का प्रयोग किया गया है, जो खुद ही प्राकृतिक स्थिरता की तरह काम करता है। यह तकनीक न केवल रासायन-मुक्त है, बल्कि यह बायोडिग्रेडेबल, बायोकम्पैटिबल और ग्रीन केमिस्ट्री के सिद्धांतों पर आधारित है। इसी कारण यह विधि जैवचिकित्सा उपयोग के लिए अधिक सुरक्षित और स्थायी मानी जाती है।

• अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका में स्वीकृति:

यह शोध कार्य एल्सेवियर-नीदरलैंड प्रकाशन समूह द्वारा अंतरराष्ट्रीय पत्रिका “ड्रग डिलीवरी साइंस एंड टेक्नोलॉजी” में प्रकाशन हेतु 28 मई 2025 को स्वीकार कर लिया गया है, जो वॉल्यूम 111, सितंबर 2025 अंक (अनुच्छेद संख्या: 107118) में प्रकाशित किया जाएगा। यह इसकी वैज्ञानिक गुणवत्ता और वैश्विक मान्यता का प्रमाण हैं। यह प्रतिष्ठित पत्रिका औषधि वितरण और फार्मास्युटिकल तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी मानी जाती है।

• हैदराबाद के आईआईसीटी से हासिल की है पीएचडी की उपाधि

डॉ. मयंक ने अपनी प्रारंभिक फार्मेसी शिक्षा बुंदेलखंड विश्वविद्यालय झाँसी (भारत) से प्राप्त की। इसके उपरांत, उन्होंने हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-भारतीय रासायनिक प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईसीटी), से फार्मास्युटिकल साइंस और प्रौद्योगिकी में पीएचडी की उपाधि अर्जित की है। साथ ही, उन्होंने नलसर विश्वविद्यालय, हैदराबाद से पेटेंट कानून में स्नातकोत्तर डिप्लोमा भी पूर्ण किया है।

डॉ. मयंक मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के चुनार तहसील के नारायणपुर विकास खण्ड के बगही गांव के निवासी हैं। डॉ. मयंक के उत्कृष्ट क्षमताओं को कोविड-19 महामारी के दौरान संयुक्त राज्य अमेरिका के आप्रवासन सेवाओं द्वारा पहचाना गया था। डॉ. मयंक के वैज्ञानिक योग्यता और शोध कार्य को अमेरिका के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संगठन सिग्मा-षि द्वारा भी मान्यता दी गई है। इनकी वैज्ञानिक अनुसंधान में उत्कृष्ट योगदान के लिए लंदन की रॉयल सोसाइटी ऑफ केमिस्ट्री द्वारा “चार्टर्ड साइंटिस्ट” के रूप में लंदन के विज्ञान परिषद् में शामिल किया गया है।

हाल ही में डॉ. मयंक सिंह को अमेरिका के प्रसिद्ध बायोग्राफिकल डायरेक्टरी (हूज़ हूँ इन अमेरिका) में भी शामिल किया गया है, जो उनके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त वैज्ञानिक योगदानों को दर्शाता है। अब वे अपने दूरदर्शी क्षमता के साथ “नेशनल डेंड्रिमर एंड नैनोटेक्नोलॉजी सेंटर” का नेतृत्व एवं निर्देशन कर रहे हैं।

वर्तमान में डॉ. मयंक “विश्व स्वास्थ्य संगठन”, जिनेवा-स्विट्ज़रलैंड के सार्वजनिक सलाहकार हैं। और “सेंट्रल मिशिगन यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन” में ग्रेजुएट फैकल्टी एवं एडजंक्ट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं। इसके अलावा, वह यूनाइटेड किंगडम-लंदन में रासायनिक जीव-विज्ञान / बायोमिमेटिक रसायन विज्ञान के प्रतिष्ठित फ़ैकल्टी के रूप में भी संयुक्त-नियुक्ति रखते है। डॉ. मयंक कई पेटेंट, शोध पत्र और पुस्तक अध्यायों के लेखक भी हैं। डॉ. मयंक को भारत, अमेरिका, लंदन, कनाडा, जापान, पुर्तगाल और स्विट्ज़रलैंड से विभिन्न पुरस्कार और मान्यताएं मिली हैं।

Suryodaya Samachar
Author: Suryodaya Samachar

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