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शुरू हो गया है चातुर्मास्य (चातुर्मास), जानिए इस समय क्या करें और क्या ना करें , जिससे भगवान की कृपा प्राप्त हो ..

*चातुर्मास्य (21.07.2024 – 15.11.2024) में क्या करें तथा क्या न करें ?*

*समय गणना*

चातुर्मास्य की गणना तीन प्रकारसे होती है – (i) आषाढ़ महीने की शुक्ला द्वादशीसे कार्त्तिक शुक्ला द्वादशी तक (ii) आषाढ़ी पूर्णिमा से कार्त्तिक पूर्णिमा तक, और (iii) श्रावण से कार्तिक तक । इनमें से किसी भी एकके अनुसार चार महीने तक नियम-सेवा का विधिवत् पालन करना चाहिये।

हम आषाढ़ी पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चातुर्मास्य का पालन करते हैं।

*उद्देश्य*

चातुर्मास्य व्रत का पालन सभी लोग करते हैं। इसका उद्देश्य नश्वर विषयी फलों तक ही सीमित नहीं है। इसका सर्व-प्रधान और चरम उद्देश्य कृष्ण प्रेमकी प्राप्ति है। इसलिए शास्त्रों में चातुर्मास्य का जो लौकिक और पारलौकिक माहात्म्य वर्णन किया गया है, उसका तात्पर्य विषय भोगोंमें आसक्त कर्मियों और मोक्षसुख में आबद्ध ज्ञानियोंको उन फलोंका लोभ दिखाकर उन्हें भक्ति मार्गमें प्रवेश करानेके लिये है जैसे किसी रोगी-बालकको मिठाईका लोभ दिखलाकर दवा दी जाये। अतएव शुद्ध कृष्णसेवाकी प्राप्ति ही चातुर्मास्य व्रतका प्रधान और अन्तिम उद्देश्य है।

*विधि*

इन 4 महीनों में हमें कुछ बाहरी तथा आंतरिक नियम पालन करने चाहिए जिससे कि पूरे वर्ष हम स्वस्थ रहकर भजन -साधन कर सकें |

*बाहरी नियम*

1. बाहरी रूप से इन 4 महीनों में विशेष रूप से स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाता है जिससे शरीर शेष 8 महीनों के लिए स्वस्थ बना रहे । शरीर के विकारों को निकालने के लिये इन 4 महीनों में भोजन, शयन आदि का ध्यान रखा जाता है |

2. प्रत्येक महीने में त्याज्य पदार्थ

(i) श्रावण मास में अर्थात पहले महीने में हरी पत्तेदार सब्जियों का त्याग करने का आदेश है |

(ii) दूसरे महीने (भाद्रपद) में दही के त्याग का आदेश है |

(iii) तीसरे माह (आश्विन) में दूध के त्याग का आदेश है |

(iv) कार्तिक मास में सरसों के तेल आदि के त्याग का आदेश है |

3. इनके अतिरिक्त चातुर्मास्य में सेम, लोबिया, परवल, बैंगन, लौकी, टमाटर, उड़द और शहद का परित्याग करना चाहिए । बासी और दूषित अन्न भोजन नहीं करना चाहिए। प्याज, लहसुन, गाजर का तो सर्वथा परित्याग करना चाहिए । धूम्रपान, मांस-मदिरा, पान, गुटका, तम्बाकू आदि का सर्वथा वर्जन करना चाहिए।

*आन्तरिक नियम*

1. हरि-सेवा-प्रवृत्तिको क्रमशः बढ़ाना चाहिए।

2. इन दिनों के लिये एक दैनिक कार्यक्रम बना लेना अच्छा होता है। सुबह प्रातः जल्दी उठकर शौचादि नित्यक्रिया करके अपने अधिकार के अनुसार नियमपूर्वक संध्या-आह्निक, पूजा-पाठ और हरि- नाम करना चाहिए।

3. हरि नाम की निर्धारित संख्या से कुछ अधिक संख्या निर्धारित करके नियमित रूपसे हरिनाम करना चाहिए।

4. प्रतिदिन भगवान् के प्रेमी भक्तोंके निकट श्रीमद्भागवत आदि भक्ति- ग्रन्थोंका श्रवण करना चाहिए। उसके अभाव में नियमितरूपमें स्वयं ही पाठ करना चाहिए ।

5. श्रीतुलसी महारानी की, भगवान्‌ के मन्दिरों की और मथुरा, वृन्दावन, पुरी आदि धामों की साधुसङ्गमें परिक्रमा करनी चाहिए ।

6. साधुसङ्ग में नवधा भक्तिका पालन करना ही सर्वोत्तम विधि है। नवधा भक्ति इस प्रकार है…..

(i)श्रवण – भगवान् के नाम, रूप, गुण और लीलाओं का श्रवण

(ii) कीर्त्तन- भगवान् के नाम, रूप, गुण और लीला-कथाओंका कीर्त्तन करना

(iii) स्मरण – भगवान् के नाम, रूप, गुण और लीला-कथाओंका स्मरण करना

(iv) पादसेवन- देशकालादिके अनुसार परिचर्या और धामादि की परिक्रमा

(v) अर्चन – षोड़षोपचार द्वारा भगवान् का पूजन

(vi) वन्दन – विविध प्रकार के स्तोत्र के द्वारा वन्दना करना – *इस वर्ष हम प्रतिदिन श्रीराधाकृपाकटाक्ष स्तवराज का पाठ करेंगे*

(vii) दास्य – मैं भगवान् का दास हूँ, ऐसी भावना रखना

(viii) सख्य – सख्य भावकी भावना करना

(ix) आत्मनिवेदन – शरीर, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, चित्त, अंहकार तथा आत्मा – सभी को भगवान् के अर्पण करना

यों तो नवधा भक्ति के किसी भी एक अङ्गका विधिवत् पालन करने से अभीष्ट पूर्ण हो सकता है, फिर भी हरिनाम संकीर्तन सर्वोपरि है। क्योंकि कृष्ण-नाम और कृष्ण-स्वरूप एक ही वस्तु हैं। अधिकन्तु कृष्ण स्वरूपकी अपेक्षा कृष्णनाम अधिक दयालु और पतित-पावन हैं। नाम-संकीर्तनमें भक्ति के ६४ अंग पूर्ण मात्रा में अनुस्युत रहते हैं। नामसंकीर्तन करनेसे नवधा भक्तिका पालन करना हो जाता है। इसलिये इन दिनों प्रतिदिन सत्सङ्गमें भगवान् के मन्दिर में अथवा इनके अभाव में किसी निर्जन स्थान में तुलसी महारानीके समीप श्रद्धापूर्वक भावपूर्ण हृदयसे हरिनाम करना चाहिए ।

7. शुद्ध वैष्णव संतों की सेवा करनी चाहिए ।

8. एक बात ध्यानमें रखनी चाहिए कि चातुर्मास्यके समस्त विधिनिषेधोंका विधिवत पालन करके भी यदि भगवद्भक्तिका आचरण न किया जाय तो वह सब कुछ प्राणरहित शरीरकी भाँति बिलकुल व्यर्थ होता है।

9. जिस प्रकार एकादशीके दिन असमर्थ व्यक्तियों के लिये अनुकल्प अर्थात् फल-फूल और दूध आदि की व्यवस्था की गयी है, उसी प्रकार चातुर्मास्यके चार महीनों तक नियम सेवा पालन करने में असमर्थ व्यक्तियों के लिये भी एक अनुकल्पकी व्यवस्था दी गयी है। वह व्यवस्था है कि केवल एक माह अर्थात् कार्तिक माह में इन सभी नियमों का पालन करना । किन्तु यह व्यवस्था केवल असमर्थ व्यक्तियों के लिये ही है सबके लिए नहींं |

*निषेध*

1. मनुष्य विषय भोगोंमें आसक्त होकर भगवान्‌ को भूल जाता है। भगवान्‌ को भूलना ही समस्त दुःखों की जड़ है। इसलिये विषयभोगोंका अधिक से अधिक जितना त्याग किया जाय, उतना ही अच्छा है। अपने भोगोंको जितना ही संकुचित किया जायेगा, मन और शरीरके धर्मोको जितना ही कम किया जायेगा, साधक हरि-सेवामें उतना ही अधिक अग्रसर होगा।

2. हरि कथाके अतिरिक्त सर्वदा मौन रहना चाहिए। जहाँ तक हो सके ऐसे लोगों से दूर रहना चाहिए, जो व्रतका पालन नहीं कर रहे हों।

3. कुसङ्गसे सर्वदा बचना चाहिए। प्रधान कुसङ्ग दो प्रकार के हैं – अभक्त तथा स्त्री-संगी का संग

4. विलासिता की वस्तुओं का प्रयोग न करना ही श्रेयस्कर है क्योंकि विलासिता हरि भजन में व्यवधान रुप ही है |

यदि इन 4 महीने तक लगातार कुछ नियमों का पालन किया तो वह हमारी आदत में आ जाते हैं । आगामी कुछ महीनों तक वह आदतें हमारे संस्कार बन जाते हैं और फिर जीवन भर चलते हैं |

इस प्रकार यथासंभव अपनी परिस्थिति, स्थिति तथा स्तर के अनुसार वैष्णवों को भजन पर केंद्रित होते हुए चातुर्मास्य व्रत का पालन करना चाहिए |

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Suryodaya Samachar
Author: Suryodaya Samachar

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