Kisan diwas 2023 : आज पूरे देश में किसान दिवस मनाया गया। किसान पूरे देश का अन्नदाता माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि यदि किसान मेहनत ना करें तो हम लोग जो अनाज खाकर अपना जीवन यापन करते हैं वह नहीं पैदा होगा। एक बहुत ही प्रचलित कहावत है- उत्तम खेती, मध्यम बान…निषिद चाकरी, भीख समान। मतलब, खेती को सबसे बेहतर…उसके बाद कारोबार और फिर नौकरी को माना जाता था, लेकिन वक्त बदला और खेती मुनाफे की जगह घाटे का सौदा मानी जाने लगी। किसान भी धीरे-धीरे खेती से किनारा करने में अपनी बेहतरी समझने लगे। कमाई के मामले में मजदूरों की स्थिति किसानों से बेहतर होती जा रही है। दिल्ली में एक अनट्रेंड मजदूर की प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी 673 रुपये है, लेकिन देश में हर महीना एक किसान औसत 10,218 रुपये की कमाई करता है।
किसान अपने खेतों में मेहनत करके पूरा दिन अपना खून जलाकर हमारे लिए अन्न उगाता है। जरा सोचिए…कमाई के मामले में किसान की स्थिति बेहतर है या मजदूर की। अब आपके जेहन में सवाल उठ रहा होगा कि हम आज अचानक किसानों की बात क्यों करने लगे। दरअसल, हमारे देश में 23 दिसंबर की तारीख को किसान दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन पूर्व प्रधानमंत्री और जाने-माने किसान नेता चौधरी चरण सिंह का जन्म हुआ था। इस मौके पर विशालकाय भारत के किसानों की स्थिति पर एक ईमानदार मंथन की जरूरत है। आज आपको बताने की कोशिश करेंगे कि जिस सरकार ने अन्नदाता की जेब में सीधा कैश डालने के लिए किसान सम्मान निधि की शुरुआत की, जिस देश में किसान सबसे बड़ा वोट बैंक हैं, जहां की आबादी का बड़ा हिस्सा किसानी से जुड़ा है…उस देश में अन्नदाता की आर्थिक हालत इतनी खराब क्यों है?
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चमकते-दमकते भारत में अन्नदाता आखिर खेती छोड़ने और आत्महत्या के लिए मजबूर क्यों हैं? क्या किसानों की हालत एक दिन में खराब हुई है? किसानों को अपनी पैदावार की सही कीमत क्यों नहीं मिलती…कैसे खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है? क्या वाकई खेती-बाड़ी में देश की 40 फीसदी आबादी के जुड़ने की जरूरत है? क्या खेती में जबरन लगी वर्क फोर्स को कहीं और शिफ्ट नहीं किया जा सकता? क्या खेती लायक जमीन पर उत्पादन और नहीं बढ़ाया जा सकता? ये कुछ ऐसे सुलगते सवाल हैं-जिनका जवाब तलाशने के लिए देश में किसानी के अतीत के पन्नों को भी पलटना होगा…आजादी के बाद खेतीबाड़ी को लेकर सियासतदानों के नजरिए और किसानी के तौर-तरीकों दोनों को समझने की कोशिश करेंगे।
भारत में किसान हमेशा से स्वाभिमानी..आत्मनिर्भर और मेहनती रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ और सामाजिक विकास में धुरी की भूमिका में रहे हैं… 30-40 साल पहले की बात है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर अक्सर कहा करते थे कि ग्रामीण क्षेत्र के किसान परिवारों से आने वाले छात्रों का तौर-तरीका बिल्कुल किसी राजकुमार दिखता है।
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Author: Suryodaya Samachar
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