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श्रीहरि की पराभक्ति से ही मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य की प्राप्ति*

 

1. कुर्वन्ति शान्तिं विबुधाः प्रहृष्टाः
क्षेमं प्रकुर्वन्ति पितामहाद्याः ।
स्वस्ति प्रयच्छन्ति मुनीन्द्रमुख्या
गोविन्द भक्ति वहतां नराणाम् ॥१॥

2. शुभा ग्रहा भूतपिशाचयुक्ता
ब्रह्मादयो देवगणाः प्रसन्नाः।
लक्ष्मीः स्थिरा तिष्ठति मन्दिरे च
गोविन्द भक्तिं वहतां नराणाम् ॥ २ ॥

3. गंगा-गया-नैमिष-पुष्कराणि
काशी प्रयागः कुरुजाङ्गलानि ।
तिष्ठन्ति देहे कृत भक्ति पूर्वं
गोविन्द भक्तिं वहतां नराणाम् ॥ ३ ॥

श्यामसुन्दर श्रीगोविन्द की परम रसमयी अति निर्मल भक्ति करने वाले मनुष्य को देवगण भी अत्यन्त पुलकित होकर शाश्वत् शान्ति प्रदान करते हैं, पितामह ब्रह्मादिक भी जिसकी प्रतिक्षण रक्षा करते हैं, भगवद् ध्यान निमग्न बड़े-बड़े मुनिवृन्द सदा-कल्याण कामना करते हैं ॥१ ॥

गोविन्द की भक्ति धारण करने वाले मनुष्य का भूत-पिशाच आदि के सहित समस्त ग्रह शुभ ही करते हैं, ब्रह्मादिक देव-समूह सर्वदा प्रसन्न रहते हैं और उसके घर में लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती है ॥२॥

श्रीगोविन्द की भक्ति करने वाले भावुक भक्त के शरीर में गङ्गा, गया, नैमिषारण्य, पुष्कर, काशी, प्रयाग और कुरुक्षेत्र भक्तिपूर्वक निवास करते हैं ॥ ३ ॥

  • पद्मपुराण के इन दिव्य श्रेष्ठतम वाक्यों में भक्ति-परायणता का कितना मार्मिक निरूपण किया गया है। इतने पर भी भूला हुआ प्राणी निरन्तर इस भवाटवी में भटक रहा है। इसलिए हमें सम्पूर्ण छल-प्रपञ्चों का त्याग करके यथार्थ रूपेण पराभक्ति से अपने अमूल्य जीवन को ओत-प्रोत करना चाहिए। हमें सतत अपने प्रेमास्पद के ध्यान में संलग्न रहते हुए उस दिव्यातिदिव्य आनन्द का अनुभव करना चाहिए जो जीवन का परम लक्ष्य और महान् उद्देश्य है ।इस भक्ति से विमुख होना ही पतन का मार्ग प्रशस्त करना है। वास्तविक भक्त कभी भी संसार के निरर्थक वाद-विवादों, क्लेशप्रद प्रपञ्चों में नहीं पड़ता । वह तो प्रतिपल अपने सर्वाराध्य श्रीश्यामाश्याम के स्मरण-चिन्तन में अविरल रूप से अवस्थित रहता है। अपनी चित्तवृत्ति को केन्द्रित करके अपने आराध्य के ध्यान में ही अपने समय का विनियोग करता है।
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श्रीयुगलसरकार की विविध रूपात्मक परिचर्या करना ही उनका ध्येय-ज्ञेय होता है। जीवन के सभी सत् कर्मानुष्ठानों के आधार भी वे ही हैं। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, अर्चन, वन्दन आदि नवधा भक्ति के अंग उन्हीं अपने हृदयाराध्य श्रीप्रियालाल के लिये ही समर्पित होते हैं। ऐसा भक्त एक क्षण भी श्रीहरि स्मरण के बिना व्यर्थ नहीं खोता। यही भक्तों और सन्तों का सच्चा वास्तविक स्वरूप है। अतः बुद्धिमान मनुष्य को श्रीहरि की इस पराभक्ति से युक्त होकर जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए।

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Avantika Singh
Author: Avantika Singh

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